पीलीभीत। स्टेशन रोड स्थित आर्य समाज मन्दिर में चल रहे वेद प्रचार उत्सव के तीसरे दिन का शुभारंभ आचार्य श्री वीरेन्द्र शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में वैदिक यज्ञ के साथ हुआ। यज्ञ में मुख्य यजमान डा.आरपी गंगवार, डा. आरएन शर्मा, सुधीर कुमार सिंह एवं विपिन कुमार पाण्डेय सपत्नीक सम्मिलित हुए, साथ ही नगर के अनेक गणमान्य नागरिकों ने वैदिक मन्त्रोच्चार के बीच अपनी आहुतियाँ अर्पित कीं।
यज्ञ के उपरान्त भजनोपदेशक भानुप्रकाश आर्य जी ने अपने मधुर कण्ठ और सुमधुर वाद्य संगीत के माध्यम से “सांसों का क्या भरोसा रूक जांय चलते चलते, जीवन की यह ज्योति बुझ जाय जलते जलते” जैसे सारगर्भित भजन प्रस्तुत कर उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।
इसके पश्चात धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री ने वेद दर्शन के अत्यंत गंभीर एवं आध्यात्मिक सिद्धांत ‘त्रैतवाद’ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेद किसी कपोल-कल्पित विचार में नहीं जीता, बल्कि जो प्रत्यक्ष है उसी को सत्य स्वीकार करता है। सृष्टि में तीन अनादि एवं नित्य सत्ताएं हैं— ईश्वर, जीव और प्रकृति। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अनादि और सर्वशक्तिमान है, जो जगत की रचना, पालन और संहार करता है। दूसरी सत्ता ‘जीव’ (मनुष्य/आत्मा) है जो अल्पज्ञ है, अनादि है तथा कर्मों के फल भोगने हेतु शरीर रूपी वस्त्र बदलती रहती है। तीसरी सत्ता ‘प्रकृति’ है जो जड़ है और पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश का मूल उपादान कारण है।
आचार्य जी ने कुम्हार, मिट्टी और घड़े के व्यावहारिक उदाहरण से स्पष्ट किया कि जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है और स्वयं घड़े से पृथक रहता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी जड़ प्रकृति से इस सम्पूर्ण जगत का निर्माण करता है और स्वयं इससे पृथक रहता है। यदि केवल एक ही सत्ता मानी जाए, तो संसार में व्याप्त सुख-दुख, पाप-पुण्य और ज्ञानी-अज्ञानी का भेद स्पष्ट नहीं हो सकता। अतः ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनों स्वतंत्र सत्ताओं के अस्तित्व को स्वीकार करना ही वास्तविक ज्ञान और बुद्धिमत्ता है।
आर्य समाज मन्दिर के मन्त्री वासुदेव गंगवार ने बताया कि इस प्रकार की ज्ञानवर्धक एवं आध्यात्मिक चर्चाएं आगामी 04 सितम्बर तक निरंतर चलती रहेंगी। उन्होंने समस्त नगरवासियों से इस ज्ञानयज्ञ में सहभागी बनने का आह्वान किया।