पीलीभीत। विश्व हाथी दिवस (12 अगस्त) के अवसर पर टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कन्जर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान ने तराई के जंगलों में एशियाई हाथियों के बदलते व्यवहार और सिकुड़ते आवास पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व और आसपास के तराई क्षेत्र में हाथियों की उपस्थिति केवल मौसम तक सीमित न रहकर एक गंभीर संरक्षण चुनौती बन गई है।
उन्होंने बताया की तीन दशक पहले वर्षा ऋतु के दौरान नेपाल की तराई से आने वाले हाथियों के झुंड में 24 से 36 (दो से तीन दर्जन) या उससे अधिक हाथी होते थे। अब यह संख्या घटकर महज दो से चार हाथियों के छोटे समूहों तक सीमित रह गई है।
पारंपरिक रास्तों में बदलाव हुआ है.हाथियों का पारंपरिक आवागमन मार्ग बराही रेंज से हरीपुर रेंज होते हुए किशनपुर वन्यजीव सेंचुरी तक रहा है। हालांकि, मानवीय दबाव के कारण अब हाथियों की गतिविधियां पीलीभीत के पश्चिमी वन क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो रही हैं।
पहले जहां हाथियों का आगमन केवल मानसून और वर्षा काल से जुड़ा था, वहीं अब वे वर्ष के विभिन्न महीनों में भी इन जंगलों में देखे जा रहे हैं।
भोजन का संकट (रोहिणी के पेड़): हाथियों के प्रिय भोजन रोहिणी प्रजाति के वृक्षों की संख्या में पुराने मार्गों पर भारी कमी आई है, जो उनके प्रवास को प्रभावित कर रही है।
मानव-हाथी संघर्ष: जंगलों से बाहर निकलने पर हाथियों को लगातार खदेड़े जाने से उनके आवागमन में असमंजस और अनिश्चितता बढ़ रही है।
संरक्षणविदों का मानना है कि केवल हाथियों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पुराने प्राकृतिक गलियारों की वैज्ञानिक पहचान, रोहिणी जैसे वृक्षों का पुनरोपण और मानव-हाथी संघर्ष को रोकने के लिए दीर्घकालिक नीति बनाना आवश्यक है।
अख्तर मियां खान ने संदेश दिया कि तराई की पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए न केवल हाथियों को बचाना होगा, बल्कि उनके पारंपरिक रास्तों और प्राकृतिक आवासों को भी सुरक्षित करना होगा।