मऊ (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा (SBSP) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर एक बार फिर कानूनी पचड़े में फंसते नजर आ रहे हैं। मऊ की एमपी-एमएलए कोर्ट ने भाजपा नेताओं को अपशब्द कहने और अभद्र टिप्पणी करने के पुराने मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राजभर के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया है।
कोर्ट ने माना ‘अदालत की अवमानना’
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एमपी-एमएलए कोर्ट) डॉ. कृष्ण प्रताप सिंह ने यह आदेश जारी किया है। दरअसल, इस मामले में अदालत ने ओमप्रकाश राजभर को कई बार समन जारी कर पेश होने का आदेश दिया था, लेकिन वे लगातार तारीखों पर गैर-हाजिर रहे। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में बाधा और अदालत की अवमानना मानते हुए पुलिस को उन्हें गिरफ्तार कर पेश करने का निर्देश दिया है।
क्या है 2019 का ‘जूता कांड’ विवाद?
यह पूरा विवाद 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान शुरू हुआ था। 17 मई 2019 को मऊ के रतनपुरा बाजार में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए ओमप्रकाश राजभर ने तत्कालीन सहयोगी दल भाजपा के नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। आरोप है कि उन्होंने मंच से भाजपा नेताओं को गाली दी थी और ‘जूता मारने’ की धमकी दी थी। इस भाषण के बाद हलधरपुर थाने में आचार संहिता उल्लंघन और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था।
सरेंडर के बाद मिली थी जमानत, फिर हुई चूक
इस मामले में राजभर पहले भी मुश्किलों में घिर चुके हैं।
- अगस्त 2025: कोर्ट द्वारा वारंट जारी होने के बाद राजभर ने मऊ कोर्ट में सरेंडर किया था।
- एक घंटे की हिरासत: सरेंडर के बाद वे लगभग एक घंटे तक न्यायिक हिरासत में रहे, जिसके बाद उन्हें 20-20 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत मिली थी।
- मौजूदा स्थिति: जमानत मिलने के बाद उन्हें नियमित रूप से कोर्ट में पेश होना था, लेकिन ऐसा न करने पर अब फिर से गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है।
अब आगे क्या?
गैर-जमानती वारंट जारी होने का मतलब है कि पुलिस अब किसी भी समय मंत्री राजभर को हिरासत में लेकर कोर्ट में पेश कर सकती है। इस स्थिति में आरोपी को पुलिस स्टेशन से जमानत नहीं मिलती, बल्कि कोर्ट के सामने पेश होकर ही अपनी दलील रखनी होती है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 मई 2026 की तारीख मुकर्रर की है।