नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या (Dowry Death) के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई जमानत पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल आरोपी पति की जमानत को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया, बल्कि उसे एक सप्ताह के भीतर कानून के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करने का भी कड़ा निर्देश दिया है।
“हाईकोर्ट के आदेश के साथ क्या गलत है?” – SC की तल्ख टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रुख पर हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर किस आधार पर इतने गंभीर मामले में आरोपी को राहत दी गई? कोर्ट ने साक्ष्यों की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका की गर्दन पर चोट के निशान (Ligature Marks) स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, तो इसे सामान्य मामला मानकर जमानत देना न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
पिता की याचिका पर हुई बड़ी कार्रवाई
यह पूरा मामला तब उच्चतम न्यायालय पहुँचा जब मृतका के पिता ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जमानत के आदेश को चुनौती दी। पिता का आरोप था कि उनकी बेटी की गला दबाकर हत्या की गई है और आरोपी को बाहर रहने देना न्याय के साथ खिलवाड़ होगा।
सुप्रीम कोर्ट के 3 बड़े निर्देश:
- तत्काल सरेंडर: आरोपी पति को एक हफ्ते के भीतर संबंधित अदालत या जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।
- समयबद्ध ट्रायल: सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को इस मामले का ट्रायल (मुकदमा) एक साल के भीतर हर हाल में पूरा करने के निर्देश दिए हैं।
- यूपी सरकार से जवाब तलब: कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से भी विस्तृत रिपोर्ट और जवाब मांगा है।
न्यायिक शुचिता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और दहेज हत्या जैसे मामलों में जमानत देते समय निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों को साक्ष्यों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।