गुरुग्राम | साइबर सिटी की चमचमाती ऊँची इमारतों और रफ़्तार भरती गाड़ियों के बीच, एक साइकिल धीमी गति से चलती है। इस साइकिल पर सिर्फ घर की सफाई करने वाली झाड़ू ही नहीं लदी हैं, बल्कि एक पिता का संघर्ष और उसकी 6 साल की मासूम बेटी का पूरा संसार टिका हुआ है। यह कहानी है उस गुमनाम पिता की, जिसने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय आत्मसम्मान के साथ अपनी बेटी की दुनिया को महकाने का फैसला किया।

पत्नी का साथ छूटा, तो बेटी ही बन गई ‘सांस’

कुछ समय पहले अपनी जीवनसंगिनी को खो देने के बाद, इस पिता के कंधों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर में 6 साल की नन्ही बेटी को अकेला छोड़ने का कलेजा नहीं था, और हाथ फैलाकर भीख मांगना उनके जमीर को मंजूर न था। बस, यहीं से शुरू हुआ सड़क पर संघर्ष का वो सफर, जिसे देख आज हर आँख नम है।

साइकिल ही घर, साइकिल ही बिस्तर

सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाला दृश्य तब होता है, जब दिन भर की थकान के बाद देर रात तक झाड़ू बेचते हुए इस मासूम बच्ची की पलकें भारी होने लगती हैं। पिता ने अपनी पुरानी साइकिल पर ही बेटी के सोने का एक छोटा सा जुगाड़ कर रखा है। जब दुनिया अपने नरम बिस्तरों पर सो रही होती है, तब यह मासूम अपनी साइकिल वाली ‘चलती-फिरती’ खाट पर पिता के पसीने की खुशबू के बीच गहरी नींद सो जाती है।

“बेटी पढ़-लिखकर अफसर बने, बस यही ख्वाहिश है”

थकान से भरी आँखों में जब भविष्य की बात आती है, तो एक चमक उभर आती है। इस पिता का कहना है, “मेरी पत्नी चली गई, पर मैं अपनी बेटी को मां की कमी महसूस नहीं होने देना चाहता। मैं चाहता हूँ कि यह पढ़-लिखकर एक बड़ी इंसान बने। मैं झाड़ू बेच लूंगा, रात भर जाग लूंगा, बस मेरी गुड़िया के चेहरे पर कभी मुफ़लिसी की आंच न आए।”

संघर्ष और खुद्दारी की मिसाल

आज के दौर में जहाँ लोग छोटी सी परेशानी में टूट जाते हैं, गुड़गांव का यह शख्स सिखाता है कि ‘जिम्मेदारी’ इंसान को हारने नहीं देती। उनकी आंखों की थकान उनके हौसले से कहीं छोटी है। यह कहानी सिर्फ एक पिता की नहीं, बल्कि उस अटूट प्रेम की है जो अभावों के बीच भी अपनी संतान के लिए सपनों का महल खड़ा करने की हिम्मत रखता है।


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