प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में अपराधियों के पैर में गोली मारने के बढ़ते मामलों, जिन्हें आम बोलचाल में ‘हाफ एनकाउंटर’ कहा जाता है, पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि अपराधियों को सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं।

प्रमोशन और सोशल मीडिया फेम के लिए फायरिंग गलत

जस्टिस की पीठ ने पुलिस अधिकारियों की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर देखा गया है कि प्रमोशन, वाहवाही और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता (फेम) हासिल करने के लिए पुलिस अनावश्यक रूप से फायरिंग करती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यप्रणाली कानून के शासन (Rule of Law) के खिलाफ है।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियां:

  1. गैर-जरूरी फायरिंग पर रोक: कोर्ट ने कहा कि अगर अपराधी आत्मसमर्पण कर रहा है या काबू में आ सकता है, तो उसके शरीर के किसी भी हिस्से (विशेषकर पैर) पर जानबूझकर गोली चलाना गलत है।
  2. सजा बनाम जांच: हाईकोर्ट ने साफ किया कि पुलिस का काम अपराध की निष्पक्ष जांच करना और अपराधी को अदालत के सामने पेश करना है। सजा सुनाना या खुद मौके पर ‘इंसाफ’ करना पुलिस का कार्यक्षेत्र नहीं है।
  3. शक्ति का दुरुपयोग: कोर्ट ने आगाह किया कि पुलिस की आत्मरक्षा की शक्ति का उपयोग ‘हाफ एनकाउंटर’ को वैध बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

मानवाधिकारों का हवाला

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी अपराधी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक कोर्ट फैसला न सुना दे। ऐसे में पुलिस द्वारा सीधे तौर पर उसे शारीरिक क्षति पहुँचाना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की ओर इशारा किया है कि पुलिस बल कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्य करें।


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