पीलीभीत। स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय के आईसीयू में एक 18 वर्षीय युवती को जीवनदान देकर डॉक्टरों ने समाज में फैली एक बड़ी भ्रांति को दूर किया है। अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मस्तिष्क ज्वर (मेनिंगोएन्सेफलाइटिस) के कारण होने वाले व्यवहार परिवर्तन, जैसे चिल्लाना या भ्रमित होना, को मानसिक बीमारी या सामाजिक समस्या समझ लेते हैं, जबकि यह एक जानलेवा शारीरिक संक्रमण हो सकता है। हाल ही में भर्ती हुई युवती को दो सप्ताह से सिरदर्द की शिकायत थी, जिसे गंभीरता से नहीं लिया गया। जब स्थिति बिगड़ी और वह असामान्य व्यवहार करने लगी, तब उसे गंभीर अवस्था में मेडिकल कॉलेज लाया गया। आईसीयू टीम की तत्परता और सटीक उपचार के चलते युवती मात्र सात दिनों में पूर्णतः स्वस्थ होकर डिस्चार्ज कर दी गई।
आईसीयू प्रभारी डॉ. अरविंद एम ने इस केस का उदाहरण देते हुए जनता को आगाह किया है कि तेज बुखार, सिरदर्द, गर्दन में जकड़न, उल्टी और अचानक स्वभाव में आए बदलाव (जैसे अत्यधिक चिड़चिड़ापन या भ्रम) को कतई नजरअंदाज न करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि मस्तिष्क में सूजन के कारण होने वाली उत्तेजना को अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं, जबकि ऐसे मामलों में हर एक घंटा कीमती होता है। मरीज के परिजनों ने आयुष्मान भारत जैसी सुविधाओं और संस्थान की विशेषज्ञता पर भरोसा जताया, जिसका परिणाम एक सफल उपचार के रूप में सामने आया।
महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. संगीता अनेजा ने जोर देते हुए कहा कि युवाओं में लगातार बने रहने वाले सिरदर्द को नजरअंदाज करना घातक हो सकता है। समय पर सही सरकारी चिकित्सा संस्थान में जांच कराने से मस्तिष्क को होने वाली स्थायी क्षति को रोका जा सकता है। वहीं, मीडिया प्रभारी डॉ. अरुण सिंह ने समुदाय से अपील की है कि बुखार के साथ व्यवहार में बदलाव एक मेडिकल इमरजेंसी है। पीलीभीत मेडिकल कॉलेज जन-जागरूकता और उच्चस्तरीय क्रिटिकल केयर सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि समय पर इलाज सुनिश्चित कर कीमती जिंदगियां बचाई जा सकें।