पीलीभीत। गन्ना कृषक स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित प्रथम दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का मंगलवार को भव्य समापन हुआ। संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘भारतीय अर्थव्यवस्था में पर्यावरण, वैश्विक जलवायु परिवर्तन और कृषिगत सतत विकास’ विषय पर केंद्रित तकनीकी सत्रों में देश-विदेश के विद्वानों ने पर्यावरण संकट और उसके समाधान पर गहन मंथन किया। तकनीकी सत्र में प्रोफेसर विपिन नीरज ने बढ़ते शहरीकरण और जंगलों के दोहन पर चिंता जताते हुए कहा कि जब हम प्रकृति के प्रति संवेदनशील होकर उसके नजदीक जाएंगे, तभी वास्तविक सतत विकास संभव है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर वीर बहादुर महतो ने भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति के साथ संतुलन बनाने और संयमित जीवन शैली अपनाने पर जोर दिया।

अटल बिहारी वाजपेई विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ के कुलपति प्रोफेसर ए.डी.एन. बाजपेई ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर अपना आशीष प्रदान किया। उन्होंने प्राचार्य डॉ. सुधीर कुमार शर्मा के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि हमें भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनाना होगा, जिसका मूल आधार परोपकार और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व है। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सुधीर कुमार शर्मा ने संस्थान के विजन को साझा करते हुए कहा कि वे इसे केवल डिग्री बांटने का केंद्र नहीं, बल्कि कौशल विकास और रोजगार सृजन का सशक्त माध्यम बनाना चाहते हैं। उन्होंने रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों पर सचेत करते हुए समाज के शोषित वर्ग के उत्थान और पर्यावरण सुरक्षा के लिए सकारात्मक कार्यों की आवश्यकता बताई।
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने तकनीकी और व्यावहारिक सुझाव साझा किए। गन्ना संस्थान लखनऊ के अरुण कुमार ने जैव विविधता के संतुलन के लिए सूक्ष्म जीवाणुओं और वृक्षों के संरक्षण को अनिवार्य बताया, वहीं अपर गन्ना आयुक्त डॉ. वी.बी. सिंह ने जैविक खेती को पर्यावरण हितैषी बताते हुए विभाग की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। इथियोपिया से जुड़े प्रोफेसर मनोज कुमार मिश्रा ने ‘सनातन इकोनॉमिक्स फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ पर विस्तार से चर्चा की। इसके साथ ही डॉ. सरिता द्विवेदी ने ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण, डॉ. नरेंद्र कुमार ने वेस्ट मैनेजमेंट और स्वास्थ्य सुरक्षा तथा प्रोफेसर अनुपम पांडेय ने कोरोना काल के बाद उत्पन्न चुनौतियों एवं समाधान पर अपने विचार रखे।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुमित्रा कुकरेती ने जलवायु परिवर्तन और प्लास्टिक कचरे के बढ़ते खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि धरती हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर बी.आर. कुकरेती ने जल संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि ग्लेशियरों का पिघलना पूरी मानवता के लिए खतरे की घंटी है। समारोह में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर विनोद श्रीवास्तव सहित अन्य अतिथियों का पटका पहनाकर व स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया गया। प्राचार्य ने गन्ना कृषकों द्वारा महाविद्यालय के लिए किए गए भूमि दान और सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
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