नई दिल्ली/प्रयागराज: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 10 अप्रैल 2026 का दिन एक बड़े घटनाक्रम के रूप में दर्ज हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया है। यह कदम तब उठाया गया है जब उनके खिलाफ संसद में महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच अंतिम दौर में है।
इस्तीफे के पीछे की असली वजह
हालांकि जस्टिस वर्मा ने अपने पत्र में ‘निजी कारणों’ का हवाला दिया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि उन्होंने यह फैसला महाभियोग के जरिए हटाए जाने की शर्मिंदगी से बचने के लिए लिया है।
संसदीय दबाव: अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 146 सांसदों के समर्थन वाले महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।
- जांच का घेरा: तीन सदस्यीय जांच समिति लगातार उन पर लगे आरोपों की पड़ताल कर रही थी।
जले हुए नोटों का वो रहस्यमय मामला
यह पूरा विवाद मार्च 2025 में शुरू हुआ था। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर आग लग गई थी। आग बुझाने पहुँचे दमकल कर्मियों और पुलिस को वहां से:
- नोटों का ढेर: लगभग ₹15 करोड़ के मूल्य के अधजले 500 रुपये के नोट और बोरियां बरामद हुई थीं।
- सुप्रीम कोर्ट का एक्शन: इस खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से हटाकर वापस उनके मूल इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया था, जहाँ उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया था।
इन-हाउस जांच की तीखी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच समिति ने अपनी 64 पन्नों की रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि नोटों का इतना बड़ा भंडार न्यायाधीश या उनके परिवार की सहमति के बिना वहां नहीं हो सकता था। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों को उन्हें बदनाम करने की एक ‘साजिश’ करार दिया था और जांच समिति के अधिकार क्षेत्र को चुनौती भी दी थी।
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