नई दिल्ली: देश में बढ़ते नफरती भाषणों (Hate Speech) के मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि नफरती भाषणों से निपटने के लिए देश के मौजूदा आपराधिक कानून पूरी तरह पर्याप्त हैं और फिलहाल किसी नए कानून या नई गाइडलाइन्स की आवश्यकता नहीं है।

“विधायी शून्यता जैसी कोई स्थिति नहीं”

अदालत ने उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि नफरती भाषणों को रोकने के लिए कानूनों की कमी है। पीठ ने कहा, “यह कहना सही नहीं है कि नफरती भाषण का क्षेत्र विधायी रूप से खाली है। भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) में पहले से ही ऐसे कड़े प्रावधान मौजूद हैं जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और समाज में वैमनस्य फैलाने वालों से निपटने में सक्षम हैं।”

कोर्ट की 3 बड़ी बातें:

  1. संसद का काम कानून बनाना: कोर्ट ने कहा कि नए अपराधों को परिभाषित करना और उनके लिए सजा तय करना पूरी तरह से विधायिका (संसद) का कार्यक्षेत्र है। न्यायपालिका सरकार को नया कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
  2. प्रवर्तन (Enforcement) की कमी: सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों को सही ढंग से लागू न करना है। अगर प्रशासन और पुलिस ईमानदारी से काम करें, तो मौजूदा कानून ही काफी हैं।
  3. मजिस्ट्रेट की शक्ति: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती है, तो पीड़ित सीधे मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है। मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश देने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति की भी आवश्यकता नहीं है।

संवैधानिक ढांचे को खतरा

न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि नफरती भाषण और अफवाहें समाज में ‘बंधुत्व’ (Fraternity) और ‘धर्मनिरपेक्षता’ (Secularism) के संवैधानिक ढांचे को चोट पहुँचाती हैं। अदालत ने माना कि हेट स्पीच को रोकने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को जागरूक होना होगा।

विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार की छूट

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए केंद्र और संबंधित अधिकारियों को यह विचार करने की छूट दी है कि क्या समय के साथ विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट (2017) के सुझावों को अपनाते हुए मौजूदा कानूनों में कोई संशोधन करने की जरूरत है या नहीं।


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