नई दिल्ली | दिल्ली की साकेत अदालत ने शनिवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेता मेधा पाटकर को आपराधिक मानहानि के एक पुराने मामले में बरी कर दिया है। यह मामला दिल्ली के वर्तमान उपराज्यपाल (LG) वी.के. सक्सेना द्वारा दायर किया गया था।
क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद साल 2006 में शुरू हुआ था। उस समय वी.के. सक्सेना ‘अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर इंक्वायरी एंड रिसोर्स एड’ (NCRA) के अध्यक्ष थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि मेधा पाटकर ने एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान उनके और उनके संगठन के खिलाफ अपमानजनक और झूठे बयान दिए थे, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष (सक्सेना पक्ष) यह साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत पेश नहीं कर सका कि पाटकर ने वास्तव में वे मानहानिकारक शब्द कहे थे जिनका आरोप लगाया गया था।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी (मेधा पाटकर) ने 2006 में टीवी कार्यक्रम के दौरान कथित मानहानिकारक बयान दिए थे। साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है।
दो दशकों का कानूनी संघर्ष
मेधा पाटकर और वी.के. सक्सेना के बीच कानूनी लड़ाई पिछले 20 वर्षों से चर्चा में रही है। इससे पहले, जुलाई 2024 में इसी तरह के एक अन्य मामले में एक निचली अदालत ने पाटकर को दोषी ठहराया था, लेकिन 24 जनवरी 2026 के इस ताजा फैसले ने उन्हें इस विशिष्ट मामले में बड़ी राहत दी है।
वर्तमान स्थिति
मेधा पाटकर वर्तमान में विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी हैं, वहीं वी.के. सक्सेना दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शिकायतकर्ता पक्ष इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देता है या नहीं।