नई दिल्ली/ब्यूरो: बैंकिंग सेक्टर में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के खिलाफ सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत ने एक कड़ा संदेश दिया है। बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व वरिष्ठ शाखा प्रबंधक पीयूष चतुर्वेदी और उनके सहयोगी मोहन सिंह सोलंकी को करोड़ों के फर्जीवाड़े के एक मामले में दोषी करार देते हुए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2016 का है, जब बैंकिंग सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर सरकारी धन का गबन किया गया था।
- फर्जी लोन: आरोपियों ने ‘विजन कम्प्यूटर’ नाम की एक डमी फर्म के नाम पर 27 लाख रुपये का व्यावसायिक ऋण (Loan) मंजूर कराया।
- फंड की हेराफेरी: ऋण राशि मंजूर होने के ठीक बाद, इस पूरी रकम को नियोजित तरीके से एक निजी कंपनी के खाते में ट्रांसफर कर दिया गया।
- साजिश का पर्दाफाश: सीबीआई की जांच में सामने आया कि यह पूरी प्रक्रिया केवल बैंक को चूना लगाने और व्यक्तिगत लाभ कमाने के उद्देश्य से रची गई एक साजिश थी।
जुर्माना और सख्त सजा
विशेष न्यायाधीश ने मामले की गंभीरता और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को देखते हुए दोनों दोषियों को कड़ी सजा सुनाई है:
- जेल: पीयूष चतुर्वेदी और मोहन सिंह सोलंकी, दोनों को 7-7 साल की बामशक्कत कैद।
- आर्थिक दंड: अदालत ने दोनों दोषियों पर 60-60 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस
अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि बैंक अधिकारियों द्वारा पद का दुरुपयोग न केवल संस्थान के भरोसे को तोड़ता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाता है। सीबीआई ने इस मामले में पुख्ता तकनीकी और दस्तावेजी सबूत पेश किए, जिसके आधार पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।
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