​पीलीभीत। जनपद की ऐतिहासिक विरासत और ब्रिटिशकालीन इंजीनियरिंग के नमूनों को सहेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। शहर के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता शिवम कश्यप ने जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह से मुलाकात कर हरदोई ब्रांच नहर पर बने दशकों पुराने पुलों के संरक्षण हेतु एक मांग पत्र सौंपा। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने आग्रह किया कि ‘प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958’ के अंतर्गत लालपुल, डगा और बाइफरकेशन पुल जैसे महत्वपूर्ण ढांचों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) लखनऊ सर्किल द्वारा संरक्षित घोषित किया जाए।

गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पूर्व डगा पुल सहित अन्य निर्माणों में दरारें आने के कारण प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से बैरिकेडिंग और दीवार लगाकर आवागमन रोक दिया था, जिससे इन विरासतों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है।
​अधिवक्ता शिवम कश्यप ने इन पुलों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये सभी संरचनाएं पीलीभीत टाइगर रिजर्व से सटी हुई हैं और चूका बीच आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आवागमन की सुविधा के लिए इन पुराने पुलों के आगे या पीछे नए निर्माण किए जा सकते हैं, लेकिन इन ऐतिहासिक धरोहरों को ध्वस्त करना जनपद की विरासत को खत्म करने जैसा होगा। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि ब्रिटिश काल में निर्मित इन्हीं नहरों और एशिया के सबसे बड़े मिट्टी की सतह वाले शारदा सागर जलाशय के माध्यम से ही पीलीभीत सहित अन्य जिलों की सिंचाई व्यवस्था संचालित होती आ रही है।


​इन पुलों का संरक्षण न केवल जनपद के गौरवशाली इतिहास को जीवित रखेगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन को भी नया आयाम देगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने सकारात्मक रुख अपनाया है। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता को आश्वस्त किया है कि वह इस विषय पर पुरातत्व विभाग के उच्चाधिकारियों से विस्तृत विचार-विमर्श करेंगे और जनहित व ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इन पत्रों को अपनी संस्तुति के साथ आगे प्रेषित करेंगे।

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