पीलीभीत। ​उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध पीलीभीत टाइगर रिजर्व अपनी समृद्ध जैव विविधता और घने साल वनों के लिए जाना जाता है, जहाँ हाल के वर्षों में बाघ और भालू की एक ही क्षेत्र में एक साथ साइटिंग ने वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के बीच एक नई चर्चा छेड़ दी है। टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान के अनुसार, यह दृश्य एक ओर जहाँ स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर भविष्य की संभावित चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है। चूँकि बाघ एक शीर्ष शिकारी है और भालू मुख्य रूप से सर्वाहारी (फल, शहद और कीटों पर निर्भर) होता है, इसलिए भोजन की आदतों में यह भिन्नता उनके बीच सीधे संघर्ष की संभावना को कम कर देती है, जिससे वे एक ही जंगल में बिना किसी टकराव के मौजूद रह पाते हैं।
​हालाँकि, यह सह-अस्तित्व पूरी तरह से जोखिम मुक्त नहीं है। खान का मानना है कि यदि भालू अपने शावकों के साथ हो और अचानक बाघ के सामने आ जाए, तो वह अत्यंत आक्रामक हो सकता है, जिससे मुठभेड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पीलीभीत के जंगलों में इन दोनों की निर्भीक मौजूदगी यह दर्शाती है कि यहाँ भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की पर्याप्त उपलब्धता है, जो जंगल के मजबूत पारिस्थितिक संतुलन का प्रमाण है। फिर भी, यदि भविष्य में मानवीय गतिविधियाँ बढ़ती हैं या जंगल का क्षेत्र सिकुड़ता है, तो संसाधनों के लिए यह प्रतिस्पर्धा संघर्ष में बदल सकती है।
​अंततः, इस परिघटना को केवल एक रोमांचक दृश्य के रूप में देखने के बजाय एक पारिस्थितिक संकेत के रूप में समझना आवश्यक है। अख्तर मियां खान ने जोर दिया है कि लगातार वैज्ञानिक अध्ययन, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से ही इस प्राकृतिक संतुलन को स्थायी बनाया जा सकता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व का यह अद्भुत तालमेल हमें संदेश देता है कि सुरक्षित वन ही विविध जीवन रूपों को फलने-फूलने का स्थान देते हैं, और हमारा दायित्व इस संतुलन को भविष्य की पीढ़ियों के लिए बचाए रखना है।

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