ह्यूस्टन/स्टॉकहोम: ‘रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज’ ने घोषणा की है कि इस वर्ष का भू-विज्ञान (Geosciences) का क्रैफोर्ड पुरस्कार भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक वीरभद्रन रामनाथन को दिया जाएगा। उन्होंने यह साबित किया कि केवल कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं, बल्कि कुछ ‘छिपे हुए प्रदूषक’ भी धरती को भट्टी बना रहे हैं।

क्यों खास है रामनाथन का शोध?

रामनाथन ने 1970 के दशक में दुनिया को चौंका दिया था जब उन्होंने बताया कि CFC (क्लोरोफ्लोरोकार्बन), जिसका इस्तेमाल उस समय फ्रिज और स्प्रे में होता था, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में जलवायु को गर्म करने में 10,000 गुना अधिक शक्तिशाली है। उनके इस शोध ने ही ‘मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल’ जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की नींव रखी।

पुरस्कार की मुख्य बातें:

  • सम्मान: रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला क्रैफोर्ड प्राइज।
  • क्षेत्र: भू-विज्ञान (जलवायु परिवर्तन और फीडबैक प्रक्रियाएं)।
  • राशि: लगभग 4.7 करोड़ रुपये (6 मिलियन स्वीडिश क्रोनर)।
  • विशेष योगदान: ब्लैक कार्बन (धुआं) और बादलों के बीच विकिरण (Radiation) के संबंध को स्पष्ट करना।

‘प्रोजेक्ट सूर्य’ और भारत से जुड़ाव

मदुरै (तमिलनाडु) में जन्मे रामनाथन ने भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘प्रोजेक्ट सूर्य’ शुरू किया, जिसका उद्देश्य खाना पकाने के पारंपरिक चूल्हों से निकलने वाले काले धुएं (Black Carbon) को कम करना था। उन्होंने दुनिया को बताया कि यह काला धुआं हिमालय की बर्फ पिघलाने में सबसे बड़ा कारक है।

क्या है क्रैफोर्ड पुरस्कार?

क्रैफोर्ड फाउंडेशन द्वारा स्थापित यह पुरस्कार खगोल विज्ञान, गणित, भू-विज्ञान और जीव विज्ञान जैसे विषयों में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। चूँकि नोबेल पुरस्कार इन विषयों में नहीं दिया जाता, इसलिए इसे वैज्ञानिक समुदाय में सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।


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