नई दिल्ली: कैदियों के मानवाधिकारों और उनके सामाजिक पुनर्वास को प्राथमिकता देते हुए उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार (26 फरवरी 2026) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ‘खुली जेलों’ (Open Correctional Institutions – OCI) और खुली बैरकों में मौजूद रिक्तियों को भरने के लिए एक निश्चित समय सीमा के भीतर प्रोटोकॉल विकसित करने का निर्देश दिया है।

क्या है ‘खुली जेल’ की अवधारणा?

खुली या अर्ध-खुली जेलें पारंपरिक बंद जेलों से अलग होती हैं। यहाँ कैदियों को:

  • आजीविका का अवसर: दिन के समय परिसर से बाहर जाकर काम करने और पैसे कमाने की अनुमति होती है।
  • पुनर्वास: शाम को उन्हें वापस जेल परिसर में लौटना होता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य: यह व्यवस्था कैदियों के मनोवैज्ञानिक दबाव को कम करने और सजा पूरी होने के बाद उन्हें समाज की मुख्यधारा में आसानी से घुलने-मिलने में मदद करती है।

कोर्ट की टिप्पणी और निर्देश

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि खुली जेलें केवल सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि पुनर्वास के प्रभावी संस्थान होने चाहिए। रिक्त पदों के कारण इन संस्थानों की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है, जिसे दूर करने के लिए राज्यों को अब जवाबदेही तय करनी होगी।


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