पीलीभीत। ​दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन में बांकेगंज–मैलाानी रेलखंड के निकट एक युवा बाघिन की दर्दनाक मौत ने वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी बताया है। प्रारंभिक जांच में सिर पर गंभीर चोट और अत्यधिक रक्तस्राव को मौत का कारण माना गया है, जिससे संकेत मिलता है कि बाघिन की मौत ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।


​अख्तर मियां खान के अनुसार, दुधवा का बफर ज़ोन पीलीभीत टाइगर रिजर्व और नेपाल के जंगलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण गलियारा है, जहाँ बाघों का विचरण निरंतर बना रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रेलवे ट्रैक वन्यजीवों के लिए एक अदृश्य और घातक खतरा बन चुके हैं। तेज रफ्तार ट्रेनें, सीमित दृश्यता और ट्रैक के आसपास जानवरों का आकर्षण अक्सर ऐसी दुखद दुर्घटनाओं का कारण बनता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह घटना इस बात का प्रमाण है कि विकास परियोजनाओं का वन्यजीवों के सुरक्षित आवास पर दबाव बढ़ रहा है।
​इस प्रकार की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अख्तर मियां ने रेलवे और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय की वकालत की है। उन्होंने सुझाव दिया कि संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों में ट्रेनों की गति को नियंत्रित करना, कॉरिडोर पर अंडरपास या ओवरपास का निर्माण सुनिश्चित करना और क्षेत्र में निगरानी तंत्र को और अधिक सुदृढ़ करना अनिवार्य है। उन्होंने अंत में चेतावनी दी कि यदि विकास और संरक्षण के बीच सही संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो बाघ जैसे शीर्ष शिकारियों की घटती संख्या का सीधा असर जंगल के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

‘किलर ट्रैक’ का खौफनाक इतिहास

मैलानी से गुजरने वाली यह रेलवे लाइन लंबे समय से वन्यजीवों के लिए घातक साबित हो रही है। पिछले दो दशकों में यहाँ 100 से अधिक वन्यजीव (जिनमें बाघ, हाथी और हिरण शामिल हैं) अपनी जान गँवा चुके हैं। ‘आधुनिक दुनिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, वन्यजीव प्रेमी लगातार इस ट्रैक पर ट्रेनों की गति कम करने या ट्रैक को वैकल्पिक मार्ग पर स्थानांतरित करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ठोस कदम अब भी नदारद हैं।

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