पीलीभीत। वर्तमान में बढ़ रहे तापमान और शुष्क मौसम को देखते हुए जिला गन्ना अधिकारी खुशी राम भार्गव ने जनपद के गन्ना किसानों के लिए एक जरूरी सलाह जारी की है। उन्होंने बताया कि इस समय गन्ने की फसल में माइट (मकड़ी) कीट का प्रकोप देखने को मिल रहा है। यह एक अत्यंत सूक्ष्म कीट है, जो गन्ने की पत्तियों की निचली सतह पर रहकर उनका रस चूसता है और फसल को भारी क्षति पहुँचाता है। इसके प्रभाव से पत्तियों पर पीले या सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं और प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां सूखने लगती हैं। इससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर गन्ने की उपज और किसानों के मुनाफे पर पड़ सकता है।
जिला गन्ना अधिकारी ने इस कीट से बचाव के लिए किसानों को समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि खेतों में पर्याप्त नमी बनाए रखना और संतुलित उर्वरक प्रबंधन बेहद जरूरी है। किसान भाई ध्यान रखें कि खेतों में नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक प्रयोग न करें, क्योंकि इससे माइट का प्रकोप और तेजी से बढ़ता है। इसके अलावा, खेतों को पूरी तरह खरपतवार मुक्त रखें और अत्यधिक प्रभावित हो चुकीं पत्तियों को काटकर नष्ट कर दें। जैविक नियंत्रण के तहत नीम आधारित उत्पादों का प्रयोग इस बीमारी में काफी लाभकारी सिद्ध होता है। साथ ही, प्रकृति में मौजूद मित्र जीवों और प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण किया जाना चाहिए। भौतिक उपाय के तौर पर अगर पत्तियों की निचली सतह पर पानी की तेज फुहार मारी जाए, तो भी माइट की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे नियमित रूप से अपनी फसल का बारीकी से निरीक्षण करें। यदि प्रकोप नियंत्रण से बाहर दिखे, तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर अनुशंसित माइटनाशी रसायनों का ही छिड़काव करें। दवा का छिड़काव करते समय विशेष ध्यान रखें कि स्प्रे पत्तियों की निचली सतह पर जरूर पहुँचे, क्योंकि यह कीट मुख्यतः वहीं छिपा रहता है। जिला गन्ना अधिकारी ने जोर देते हुए कहा कि केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक, सांस्कृतिक, भौतिक और रासायनिक उपायों के समन्वित (मिले-जुले) प्रयोग से ही इस कीट का पर्यावरण-अनुकूल नियंत्रण संभव है। गन्ना विकास विभाग किसानों को हर संभव तकनीकी जानकारी और सहायता उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।