पीलीभीत। पीलीभीत-गजरौला नेशनल हाईवे पर फैला अवैध अतिक्रमण अब राहगीरों के लिए काल का ग्रास बनता जा रहा है। हाईवे के दोनों ओर लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की 45 मीटर चौड़ी आरक्षित भूमि पर किए गए पक्के और अस्थाई अवैध निर्माणों के कारण सड़क लगातार संकरी होती जा रही है। इसका खौफनाक नतीजा यह है कि बीते महज एक वर्ष के भीतर इस मार्ग पर दो दर्जन से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल होकर अपंगता का शिकार हुए हैं।

पीलीभीत से गजरौला तक के लगभग 18 किलोमीटर लंबे इस खंड में हाईवे के दोनों ओर मोरंग, बजरी के ढेरों और फुटपाथ पर सजी दुकानों ने यातायात को बुरी तरह बाधित कर दिया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि रात के अंधेरे में सड़क किनारे फैले इस अतिक्रमण के कारण भीषण दुर्घटनाएं आम हो गई हैं। आलम यह है कि हर हादसे के साथ किसी न किसी परिवार का चिराग बुझ रहा है, लेकिन प्रशासन इस गंभीर समस्या को लेकर पूरी तरह मौन साधे हुए है।

हैरानी की बात यह है कि ग्रामीण पिछले कई वर्षों से इस समस्या को लेकर शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। गजरौला क्षेत्र के दर्जनों ग्रामीणों ने फरवरी 2023 में लोक निर्माण विभाग को लिखित शिकायत दी थी, जिसके बाद विभाग ने करीब 45 लोगों को नोटिस जारी कर खानापूर्ति कर ली। ग्रामीणों का आरोप है कि राजनीतिक रसूख और प्रशासनिक मिलीभगत के चलते तीन साल से अतिक्रमण हटाने की फाइल ठंडे बस्ते में पड़ी है। वर्ष 2024 में भी केवल तीन स्थानों से अतिक्रमण हटाकर इतिश्री कर ली गई, जबकि मुख्य अवैध निर्माण आज भी जस के तस बने हुए हैं।

जनता का दर्द है कि एक ओर पुलिस प्रशासन हेलमेट और सीट बेल्ट के नाम पर चालान काटकर अपनी सक्रियता दिखाता है, वहीं सड़क हादसों की मुख्य जड़ ‘अतिक्रमण’ पर उसकी नजर नहीं पड़ती। लोक निर्माण विभाग और जिला प्रशासन की इस चुप्पी ने पूरी यातायात व्यवस्था को चरमरा दिया है। अब सवाल यह उठता है कि हाईवे पर होने वाली इन मौतों का असली जिम्मेदार कौन है और प्रशासन आखिर कितनी और जिंदगियां कुर्बान होने का इंतजार कर रहा है?