पीलीभीत। जनपद में 17 मई से पवित्र पुरुषोत्तम मास का शुभारंभ हो गया है। इस पावन अवसर पर वैष्णवाचार्य गोपी जीवन गोस्वामी के दिशा-निर्देशन में निरंतर व्रज 84 कोस मानसिक परिक्रमा का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। पुरुषोत्तम मास के विशेष महत्व पर प्रकाश डालते हुए वैष्णवाचार्य ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष में आने वाले एक अतिरिक्त चंद्रमास को पुरुषोत्तम मास, मलमास या अधिक मास कहा जाता है। यह मास पूरी तरह से भगवान विष्णु के जप, दान और भक्ति के लिए समर्पित है तथा इसे आत्मशुद्धि और प्रभु उपासना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। पद्म पुराण का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। इस दौरान भागवत कथा श्रवण, तीर्थ यात्रा और दान करना अत्यंत उत्तम माना गया है। चूंकि इस मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती अर्थात सूर्य अपनी राशि नहीं बदलते हैं, इसलिए इस अवधि में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
84 कोस परिक्रमा की महत्ता को विस्तार से समझाते हुए वैष्णवाचार्य गोपी जीवन गोस्वामी ने बताया कि व्रज 84 कोस परिक्रमा वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन आदि की लगभग 250 से 300 किलोमीटर की पैदल धार्मिक यात्रा है। 40 दिनों में पूरी होने वाली इस यात्रा में 12 वन, 24 उपवन और प्रमुख कुंड शामिल हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति है। उन्होंने कहा कि इस परिक्रमा को श्रद्धापूर्वक करने से जीव को 84 लाख योनियों के चक्र से मुक्ति मिलती है और ब्रजमंडल में भगवान कृष्ण की बाल व रासलीलाओं के पवित्र स्थलों के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त होता है। पीलीभीत में आयोजित हो रही इस मानसिक परिक्रमा के तहत आयोजन स्थल पर जगह-जगह नंदगांव, राधा कुंड और बरसाना आदि पवित्र स्थानों को प्रतीकात्मक रूप से नामित किया गया है, जिससे श्रद्धालुओं को घर बैठे ही ब्रज यात्रा का अलौकिक अनुभव और कल्याणकारी फल मिल रहा है। इस मानसिक यात्रा के दसवें दिन गुरु मां मधु गोस्वामी, गौरँग, शिवा, सोनिया, पूनम, संजय अग्रवाल, सीमा अग्रवाल, पुष्पा, कपिल, निहारिका, कविता जोशी, शिवरतन मालपानी, पुष्पा मालपानी, वंदना, पंकज महतिया और डॉ. मोनिका सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान लक्ष्मीकांत शर्मा ने पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक और खगोलीय आधार की जानकारी देते हुए बताया कि हिंदू कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित होता है। सौर वर्ष जहाँ 365 दिनों का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। इन दोनों के बीच प्रतिवर्ष लगभग 11 दिनों का जो अंतर आता है, वही तीन साल में एकत्र होकर एक अतिरिक्त महीने (अधिक मास) के रूप में जुड़ जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस अतिरिक्त महीने का कोई स्वामी ग्रह या देवता न होने के कारण प्रारंभ में इसे अशुभ या मलमास माना गया था। तब इस मास की करुण प्रार्थना को सुनकर भगवान विष्णु ने इसे अपना सर्वश्रेष्ठ नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और इसे सभी महीनों में सबसे पवित्र मास घोषित कर दिया, जिसके बाद से यह कालखंड हरि-भक्ति का सर्वोत्तम माध्यम बन गया।