पीलीभीत। भारत विकास परिषद शाखा टाइगर रोहिलखंड प्रांत पूर्वी एनसीआर-1 के तत्वाधान में आज कंपोजिट विद्यालय नाखासा में सेवा पखवाड़े का अत्यंत भव्य और गरिमामयी शुभारंभ हुआ। यह विशेष आयोजन परिषद के परम आदरणीय संस्थापक डॉ. सूरज प्रकाश की पावन जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। इस गौरवपूर्ण अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक अशोक कुमार शर्मा, कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. आर.पी. गंगवार, विशिष्ट अतिथि बी.के. कपूर, रवि प्रकाश चंद्रा, डॉ. विजय कुमार सिंह तथा मनोज मित्तल द्वारा संयुक्त रूप से माँ भारती और डॉ. सूरज प्रकाश जी के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मंचासीन अतिथियों और वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा उपस्थित विद्यार्थियों एवं गणमान्य नागरिकों को डॉ. सूरज प्रकाश जी के ओजस्वी व्यक्तित्व, प्रेरणादायी जीवन दर्शन तथा समाज सेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक कृतित्व के बारे में अत्यंत विस्तार से जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं ने ऐतिहासिक संदर्भों को साझा करते हुए विद्यार्थियों को अवगत कराया कि भारत विकास परिषद के संस्थापक डॉ. सूरज प्रकाश जी का जन्म पंजाब प्रांत के गुरदासपुर जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम चंबल में हुआ था। आप अपने परिवार में ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनकी माता का नाम श्रीमती माला देवी तथा पिता का नाम रामसरण महाजन था। आपका संपूर्ण परिवार आर्य समाजी विचारधारा से ओत-प्रोत था, जिसके कारण बचपन से ही आपके भीतर राष्ट्रवाद और समाज सेवा के संस्कार अंकुरित हुए। डॉ. सूरज प्रकाश बौद्ध दर्शन और महात्मा गौतम बुद्ध के अमर संदेश ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो से बहुत गहरे से प्रभावित थे। उन्होंने इसी आत्म-निर्भरता और आत्म-ज्ञान के सिद्धांत को अपने जीवन का मूल आधार बनाया और जीवनपर्यंत दूसरों को भी इसी मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते रहे।
वक्ताओं ने उनके जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण सेवा कार्यों को रेखांकित करते हुए बताया कि सन् 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के अत्यंत कठिन समय में डॉ. सूरज प्रकाश ने देश की रक्षा में लगे घायल सैनिकों की सेवा का महती बीड़ा उठाया था। उन्होंने रात-दिन अथक परिश्रम कर घायल वीर जवानों के लिए आवश्यक सहायता सामग्री, दवाइयां और अन्य जीवनोपयोगी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि जीवन में किसी भी प्रकार के सामाजिक या पारिवारिक उत्तरदायित्व के बोझ को हमेशा छोटे भाई के समान सहजता और सहृदयता के साथ उठाना चाहिए। वे काम को टालने के बजाय ‘कार्य ही पूजा है’ के सिद्धांत का अक्षरशः अनुसरण करने वाले एक महान कर्मयोगी थे। उनके कुशल मार्गदर्शन का ही परिणाम है कि भारत विकास परिषद की सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय मुख्य पत्रिका ‘नीति’ का गौरवशाली प्रकाशन सन् 1969 से अनवरत रूप से आरंभ हुआ तथा राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने वाली राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता की ऐतिहासिक शुरुआत सन् 1967 में की गई थी।
इस पावन जयंती आयोजन के अंतर्गत स्कूली बच्चों के ज्ञानवर्धन हेतु डॉ. सूरज प्रकाश के जीवन वृत्त पर आधारित एक अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तरी (क्विज) प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने बहुत ही उत्साहपूर्वक और बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिसमें छवि, आराध्या, स्वाति और सोनम आदि छात्राओं ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस बौद्धिक प्रतियोगिता की सभी विजेता बालिकाओं को कार्यक्रम के अतिथियों द्वारा मुख्य मंच पर अत्यंत आदरपूर्वक प्रशंसा पत्र (प्रशस्ति पत्र) तथा मेमेंटो व पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया, जिससे बच्चों के चेहरे खिल उठे। इसके उपरांत, कार्यक्रम में उपस्थित समस्त प्रतिभागियों को डॉ. सूरज प्रकाश जी के जीवन और उनके महान सेवा कार्यों पर आधारित एक सुंदर वृत्तचित्र (शॉर्ट वीडियो) भी दिखाया गया। वीडियो देखने के बाद बच्चों ने अपनी उत्साहजनक प्रतिपुष्टि (फीडबैक) दर्ज कराई और सामूहिक रूप से यह दृढ़ संकल्प लिया कि वे भविष्य में डॉ. सूरज प्रकाश जी के महान विचारों और आदर्शों का अक्षरशः अनुसरण करते हुए देश व समाज के हित में कार्य करेंगे। इस संपूर्ण सेवा पखवाड़ा उद्घाटन कार्यक्रम को धरातल पर सफल और सुव्यवस्थित बनाने में अमित कुमार, रामविलास तथा डुमनेश्वरी देवी का विशेष, सराहनीय और सक्रिय योगदान रहा।