कहते हैं कि संपन्नता और ऊंचे रिश्ते दुखों के समय ढाल बनते हैं, लेकिन पीलीभीत की एक बेटी ‘अलीशा’ (परिवर्तित नाम) के लिए ये तमाम दलीलें खोखली साबित हो रही हैं। एक अच्छे परिवार में जन्मी, स्नातक तक शिक्षित और खुशहाल सपनों के साथ ससुराल गई अलीशा आज नियति के क्रूर प्रहार और अपनों की बेरुखी के कारण तिल-तिल मरने को मजबूर है।
​खुशियों से अवसाद तक का सफर
शहर से सटे एक गांव की मूल निवासी अलीशा का परिवार संपन्न था। माता-पिता के लाड-प्यार में पली-बढ़ी अलीशा की शादी एक अच्छे परिवार में हुई थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शादी के बाद वह गहरे अवसाद (डिप्रेशन) की गिरफ्त में आ गई। वैवाहिक जीवन में आई कड़वाहट के कारण पति ने उसे तलाक दे दिया, जिसके बाद वह पीलीभीत की केजीएन टू कॉलोनी में रहने लगी। दुखों का पहाड़ तब टूटा जब पहले मां और फिर पिता का साया सिर से उठ गया। एक बहन विदेश में होने के कारण अलीशा घर में बिल्कुल अकेली पड़ गई।
​बदहाली की पराकाष्ठा
अकेलेपन और बीमारी ने अलीशा को इस कदर तोड़ दिया कि वह हफ्तों तक घर में भूखी-प्यासी बंद रहने लगी। गंदगी और संक्रमण के बीच उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि पड़ोसियों के लिए घर में घुसना तक दूभर हो गया। दुबई में रह रही उसकी बहन की पहल पर कुछ समाजसेवियों ने हिम्मत दिखाई और उसे बोरा अस्पताल में भर्ती कराया। उपचार के बाद उसकी स्थिति में सुधार तो हुआ, लेकिन घर वापसी के बाद कहानी फिर वही दोहराई जाने लगी। देखभाल के लिए रखी गई केयरटेकर भी उसकी हालत देख उसे छोड़ कर चली गई।
​प्रशासन ने लिया संज्ञान, मदद की कोशिशें जारी
इस मार्मिक मामले की गूँज जब प्रशासनिक गलियारों तक पहुँची, तो सिटी मजिस्ट्रेट विजयवर्धन तोमर ने मामले का तत्काल संज्ञान लिया। उन्होंने जिला प्रोबेशन अधिकारी को प्रभावी कार्रवाई करने और कोतवाली पुलिस को समन्वय स्थापित करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
​मानवीय आधार पर नगर के प्रमुख व्यापारी अनूप अग्रवाल ने भी अलीशा के घर पहुँचकर उसकी सुध ली। प्रयास किए जा रहे हैं कि परिजनों और केयरटेकर की सहमति लेकर उसे उचित उपचार और देखरेख के लिए ‘अपना घर’ जयपुर भेजा जा सके। हालांकि, कानूनी औपचारिकताओं और सहमति के अभाव में फिलहाल कोई ठोस सफलता नहीं मिल सकी है। वर्तमान में अलीशा यूरिन इंफेक्शन और गहरे जख्मों से जूझ रही है, जहाँ उसकी संपन्न रिश्तेदारी महज कागजी साबित हो रही है।

यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है—
क्या सच में संपन्नता और बड़े रिश्ते इंसान को सुरक्षित बना पाते हैं… या फिर मुश्किल वक्त में सबसे ज्यादा जरूरत सिर्फ एक हाथ की होती है, जो समय पर थाम लिया जाए?

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