​पीलीभीत। विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान ने गौरैया संरक्षण की एक प्रेरक गाथा साझा की है। उन्होंने बताया कि कभी हर घर के आंगन की शान कही जाने वाली यह नन्ही चिड़िया आधुनिकता और कंक्रीट के जंगलों के कारण विलुप्ति की कगार पर पहुँच गई थी। अख्तर मियां के अनुसार, वर्ष 2003 में पीलीभीत और दुधवा क्षेत्रों में किए गए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था कि गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। इसका मुख्य कारण आधुनिक मकानों में प्राकृतिक घोंसलों (Nesting Sites) के लिए जगह की कमी होना था। पुरानी खपरैल और दीवारों के छेद खत्म होने से गौरैया के पास प्रजनन के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बचे थे।
​इस संकट को देखते हुए अख्तर मियां ने वर्ष 2006-07 में एक अभिनव प्रयोग शुरू किया, जिसके तहत लकड़ी के कृत्रिम घोंसले बनाकर विभिन्न स्थानों पर लगाए गए। शुरुआती दौर में लगाए गए 40 घोंसलों में से 34 में गौरैया ने अपना बसेरा बनाया और लगभग 80 बच्चों का सुरक्षित जन्म हुआ। इस सफलता ने सिद्ध कर दिया कि यदि गौरैया को सुरक्षित आवास मिले, तो उनकी संख्या को पुनः बढ़ाया जा सकता है। वर्ष 2010-11 तक यह आंकड़ा और बढ़ा, जहाँ 50 घोंसलों से 140 बच्चों का सफलतापूर्वक निकलना दर्ज किया गया। अख्तर मियां की यह मुहिम समय के साथ एक बड़े अभियान में बदल गई, जिससे हजारों गौरैया के बच्चों को जीवनदान मिला।


​संरक्षण के इन प्रयासों को शैक्षणिक और सामाजिक विस्तार देने के लिए वर्ष 2020-21 में पीलीभीत टाइगर रिजर्व द्वारा अख्तर मियां खान की लिखित पुस्तक “गौरैया: आंगन की शान” का विमोचन भी किया गया। यह पुस्तक आम जनमानस को गौरैया संरक्षण के सरल तरीकों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनी है। अख्तर मियां का मानना है कि केवल सरकारी प्रयासों से प्रकृति को नहीं बचाया जा सकता, इसके लिए सामुदायिक भागीदारी अनिवार्य है। उन्होंने अपील की है कि हर व्यक्ति अपने घर, स्कूल या संस्थान में कम से कम एक कृत्रिम घोंसला लगाए और दाना-पानी की व्यवस्था करे। रसायनों और कीटनाशकों के कम प्रयोग तथा थोड़े से मानवीय प्रयास से हम अपनी इस सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत को फिर से हर आंगन में चहका सकते हैं।

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