-डॉ.अमिताभ अग्निहोत्री–
पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) और विश्व प्रकृति निधि भारत के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय जल निकायों के संरक्षण तथा ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन के लिए शुरू किया गया ‘जलकुंभी हस्तशिल्प कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम’ अब धरातल पर अपना व्यापक और सकारात्मक प्रभाव दिखाने लगा है। पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाने वाली आक्रामक जलकुंभी से बने आकर्षक हस्तशिल्प और उत्पाद न केवल प्रकृति के संरक्षण में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं, बल्कि तराई क्षेत्र की ग्रामीण महिलाओं के लिए सम्मानजनक आजीविका और आय का एक सुदृढ़ साधन भी बनकर उभरे हैं। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ आजीविका सृजन के इस बेजोड़ समन्वय ने हरित उद्यमशीलता का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया है।

पीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह के कुशल मार्गदर्शन में इस दूरदर्शी आजीविका योजना को अमलीजामा पहनाया गया है। वन प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को संकट में डालने वाली जलकुंभी की विकराल समस्या का स्थायी समाधान खोजना और साथ ही जंगलों व टाइगर रिजर्व के सीमावर्ती गाँवों से जुड़ी महिलाओं को स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। इसके तहत विश्व प्रकृति निधि के सहयोग से स्थानीय सामुदायिक संस्थाओं को जोड़कर उनकी क्षमता को निरंतर मजबूत किया जा रहा है, ताकि पीलीभीत के ग्रामीण विकास की मुख्यधारा में प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक और प्रभावी प्रबंधन को स्थाई रूप से शामिल किया जा सके।

इस कूटनीतिक और पर्यावरण-अनुकूल पहल के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के हिस्से के रूप में पीटीआर की बराही रेंज के अंतर्गत आने वाले ग्राम पुरैना (महाराजपुर) में इस कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम का विशेष आयोजन किया गया था। जलकुंभी मूल रूप से एक अत्यंत आक्रामक जलीय खरपतवार है, जो प्राकृतिक जल निकायों में तीव्र गति से फैलकर जलीय जैव विविधता और ऑक्सीजन के स्तर को बुरी तरह प्रभावित करती है। इसके अत्यधिक प्रसार के कारण जलाशयों में नावों का आवागमन और मत्स्य पालन बाधित हो जाता है, जिससे स्थानीय मछुआरा समुदायों की आजीविका पर संकट मंडराने लगता है। इस दोहरी चुनौती से निपटने के लिए जलाशयों से जलकुंभी को हटाकर उसे कच्चे माल के रूप में उपयोग करने की रणनीति अपनाई गई, जो एक तरफ जलीय पर्यावरण को पुनर्जीवित कर रही है और दूसरी तरफ ग्रामीण महिलाओं के भाग्य को बदल रही है।

कौशल विकास के इस विशेष अभियान का नेतृत्व मुख्य प्रशिक्षक (ट्रेनर) शशिकला द्वारा किया गया, जिन्होंने स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHG) की 25 उत्साही महिलाओं को इस जटिल कला का व्यावहारिक और गहन प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान इन महिलाओं ने आक्रामक जलकुंभी के रेशों को सुखाकर उनसे अत्यधिक आकर्षक, टिकाऊ और बाजार की मांग के अनुरूप उपयोगी वस्तुएं जैसे—पेन स्टैंड, फैंसी टोपियां, कृत्रिम फूल, विभिन्न आकारों की टोकरियां, मैट (चटाई), सर्विंग ट्रे और ट्रेंडी बैग्स बनाने का हुनर और आत्मविश्वास हासिल किया। इन उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के निर्माण से महिलाओं को घर बैठे अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है, जिससे उनके परिवारों का सामाजिक और आर्थिक स्तर सुधर रहा है।

यह अभिनव कार्यक्रम केवल हस्तशिल्प निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिंगल-यूज प्लास्टिक के खिलाफ एक मजबूत और बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले) विकल्प के उत्पादन को भी सीधे तौर पर प्रोत्साहित कर रहा है। ग्रामीण महिलाओं में उद्यमशीलता के गुणों को विकसित करके और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सामूहिक उद्यम को बढ़ावा देकर, इस पहल ने महिला सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयां दी हैं। स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का यह कुशल प्रबंधन एक साथ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, महिला आत्मनिर्भरता, हरित रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर रहा है, जो भविष्य के सामुदायिक संरक्षण अभियानों के लिए देश भर में एक मार्गदर्शक और प्रेरणादायी मिसाल साबित होगा।