पीलीभीत। हर साल 21 फरवरी को ‘विश्व पैंगोलिन दिवस’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस अद्वितीय और शांत जीव के अस्तित्व पर मंडराते खतरों के प्रति दुनिया को आगाह करना है। तराई के बेल्ट में स्थित पीलीभीत टाइगर रिजर्व और दुधवा टाइगर रिजर्व अपनी बाघों की आबादी के लिए विश्व विख्यात हैं, लेकिन इन्हीं जंगलों के शांत कोनों में पैंगोलिन जैसा दुर्लभ प्राणी भी निवास करता है। अपनी विशेष शारीरिक बनावट, शरीर पर शल्कों के कवच और लंबी जीभ के लिए पहचाने जाने वाले ये जीव आज उपेक्षा और अवैध तस्करी के दोहरे जाल में फंसे हैं। टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान का मानना है कि यदि समय रहते इनके संरक्षण पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, तो तराई के पारिस्थितिकी तंत्र से यह महत्वपूर्ण कड़ी हमेशा के लिए टूट जाएगी।
अख्तर मियां कहते है की पैंगोलिन केवल एक जीव नहीं, बल्कि पर्यावरण के रक्षक भी हैं। इन्हें ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ कहा जा सकता है क्योंकि ये मिट्टी में गहरे छेद खोदकर कीटों, विशेषकर दीमक और चींटियों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। इससे न केवल फसलों और पेड़ों को नुकसान से सुरक्षा मिलती है, बल्कि मिट्टी के वातन में भी सुधार होता है, जो अंततः जंगल की उर्वरता बढ़ाता है। पीलीभीत के ऊसर क्षेत्रों और दुधवा के जलोढ़ मैदानों में इनकी उपस्थिति एक स्वस्थ इकोसिस्टम का संकेत है। इसके बावजूद, रात्रिचर और बेहद शर्मीले स्वभाव के होने के कारण ये अक्सर मानवीय नज़रों से ओझल रहते हैं, जिसका नुकसान इनके संरक्षण प्रयासों को उठाना पड़ता है।
अस्तित्व पर मंडराते खतरे: तस्करी और आवास का विनाश
वर्तमान में पैंगोलिन दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारियों में शुमार हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण उनके शल्कों को लेकर फैली भ्रांतियां हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनके शल्कों की भारी मांग है, जहाँ अंधविश्वास के चलते इन्हें औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। अवैध शिकार के अलावा, आवास का विखंडन भी एक बड़ी चुनौती है। कृषि विस्तार, अवैध खनन और वनाग्नि के कारण इनके प्राकृतिक घर नष्ट हो रहे हैं। पीलीभीत और दुधवा के सीमावर्ती इलाकों में मानव गतिविधियों के बढ़ने से इनके प्रजनन और विचरण के क्षेत्र सिमटते जा रहे हैं, जिससे इनकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
पैंगोलिन को विलुप्त होने से बचाने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले, स्थानीय समुदायों और पर्यटकों के बीच व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है ताकि लोग इसे केवल एक ‘जानवर’ नहीं बल्कि पर्यावरण के रक्षक के रूप में देखें। वन विभाग को पीलीभीत और दुधवा में विशेष ‘पैंगोलिन निगरानी इकाइयां’ गठित करनी चाहिए, जो आधुनिक तकनीक के माध्यम से इनके व्यवहार और संख्या का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें। इसके साथ ही, पुलिस और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के समन्वय से तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त करना अनिवार्य है।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि “पैंगोलिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 के तहत एक अति-संवेदनशील और संरक्षित जीव है। विभाग इसके संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और जंगल के भीतर इनके प्राकृतिक वास स्थलों की सघन निगरानी की जा रही है। वनाग्नि और अवैध शिकार जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए गश्त बढ़ाई गई है और हम स्थानीय स्तर पर ऐसी विशेष टीमें गठित करने पर विचार कर रहे हैं जो इन दुर्लभ जीवों के व्यवहार का अध्ययन कर इनके संरक्षण की वैज्ञानिक रणनीति तैयार कर सकें। आम जनमानस का सहयोग इस दिशा में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होगा।
विश्व पैंगोलिन दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रकृति का हर छोटा-बड़ा जीव एक विशिष्ट जिम्मेदारी निभाता है। अख्तर मियां खान ने अपील की है कि इस 21 फरवरी को हम सब मिलकर पीलीभीत और दुधवा के इन ‘मूक प्रहरियों’ को बचाने का संकल्प लें। यदि हम स्थानीय स्तर पर संरक्षण रणनीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कर पाए, तो न केवल पैंगोलिन का अस्तित्व सुरक्षित होगा, बल्कि यह तराई क्षेत्र में प्रकृति-पर्यटन और जैव विविधता के एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा।