पीलीभीत। स्थानीय कृषि उत्पादन मंडी समिति को विभिन्न सरकारी क्रय एजेंसियों से लाखों रुपये के मंडी शुल्क का भुगतान मिलना अभी बाकी है। चालू वित्तीय वर्ष और पिछले सत्रों के दौरान गेहूं व धान खरीद केंद्र स्थापित करने वाली इन एजेंसियों ने लंबे समय से मंडी शुल्क चुकता नहीं किया है, जिसे देखते हुए मंडी सचिव ने कड़ा रुख अपनाया है।
मंडी सचिव प्रवीण अवस्थी ने संबंधित एजेंसियों के जिला प्रबंधकों सहित लखनऊ स्थित उच्च अधिकारियों को पत्र भेजकर तत्काल भुगतान सुनिश्चित कराने का आग्रह किया है। नियमों के मुताबिक, रबी और खरीफ विपणन सत्र के दौरान किसानों से धान और गेहूं की सरकारी खरीद के लिए कृषि उत्पादन मंडी समिति परिसर या उसके अधिकार क्षेत्र में विभिन्न क्रय एजेंसियों द्वारा क्रय केंद्र स्थापित किए जाते हैं, जिन पर होने वाली कुल खरीद के आधार पर निर्धारित मंडी शुल्क देय होता है। इसे सरकारी खजाने में जमा कराना अनिवार्य है, लेकिन क्रय एजेंसियों की ढिलाई के चलते यह राशि अटकी हुई है। मंडी समिति के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सहकारिता क्षेत्र की तीन प्रमुख क्रय एजेंसियों पर ही अकेले लाखों रुपये का मंडी शुल्क बकाया है। बकाएदारों की सूची में सहकारिता की सबसे बड़ी एजेंसी पीएससी पर सबसे ज्यादा 27,74,252 रुपये, उत्तर प्रदेश सहकारी संघ (यूपीसीएफ) पर 4,13,865 रुपये और प्रादेशिक को-ऑपरेटिव यूनियन (पीसीयू) पर 1,51,122 रुपये का मंडी शुल्क बकाया है। इन तीनों संस्थाओं को मिलाकर कुल बकाया राशि लगभग 33 लाख रुपये से अधिक बैठती है, जिसमें सहकारिता की सबसे बड़ी क्रय एजेंसी की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। मंडी समिति के राजस्व को हो रहे इस नुकसान को देखते हुए मंडी सचिव प्रवीण अवस्थी ने सख्त कदम उठाए हैं और इन सभी सहकारी संस्थाओं के जिला स्तरीय प्रबंधकों को नोटिस जारी करने के साथ-साथ उनके मुख्यालयों और उच्चाधिकारियों को भी पूरे मामले से अवगत कराया है। मंडी सचिव ने बताया कि विभिन्न क्रय एजेंसियों पर मंडी शुल्क का लाखों रुपया बकाया है और बार-बार ध्यान आकर्षण के बावजूद राशि जमा नहीं कराई गई, इसलिए अब संबंधित संस्थाओं के जिला प्रबंधकों और उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर आग्रह किया गया है कि वे जल्द से जल्द इस बकाया शुल्क का भुगतान मंडी समिति को हस्तांतरित करें ताकि सरकारी राजस्व की क्षति न हो। एक तरफ जहां सरकार मंडी समितियों की आय बढ़ाने और पारदर्शिता लाने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी और सहकारी क्षेत्र की ही एजेंसियों द्वारा समय पर टैक्स न चुकाना विभागीय समन्वय पर सवाल खड़े करता है, और जानकारों का मानना है कि यदि इन एजेंसियों ने जल्द ही भुगतान नहीं किया, तोl आगामी खरीद सत्रों में इनके केंद्रों की अनुमति को लेकर पेंच फंस सकता है।