विधि संवाददाता, पीलीभीत। जनपद के बहुचर्चित मानव-वन्यजीव संघर्ष के एक सात साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चल रही कानूनी कार्यवाही पर रोक लगा दी है। न्यायालय के इस आदेश से उन 31 ग्रामीणों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से अदालती चक्कर काटने को मजबूर थे। यह पूरा प्रकरण 24 जुलाई 2019 का है, जब पीलीभीत टाइगर रिजर्व की दियोरिया रेंज से सटे मटेहना गांव के एक खेत में राधेश्याम पुत्र ठगई प्रसाद कृषि कार्य कर रहे थे। इसी दौरान जंगल से निकले एक बाघ ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। अपने साथी को बचाने के प्रयास में वहां मौजूद अन्य ग्रामीणों ने लाठी-डंडों से बाघ का मुकाबला किया था, जिसमें कई ग्रामीण घायल हुए थे और इस आपसी संघर्ष में बाघ की भी जान चली गई थी।
घटना के बाद वन विभाग ने कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन वन दरोगा दिनेश गिरी के माध्यम से 31 ग्रामीणों के विरुद्ध वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। पुलिस द्वारा इस मामले की विवेचना की ही जा रही थी कि इसी बीच वन विभाग ने न्यायालय में एक अलग परिवाद (कम्प्लेंट) भी दाखिल कर दिया। इस परिवाद पर संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट ने आरोपियों के खिलाफ गैर जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिए थे। एक ही घटना के लिए पुलिस की विवेचना और वन विभाग के परिवाद जैसी दो अलग-अलग कार्यवाहियों से परेशान होकर पीड़ित ग्रामीणों ने हाईकोर्ट की शरण ली।
उच्च न्यायालय में पीड़ितों की ओर से अधिवक्ता मधु रंजन पांडे ने प्रभावी पैरवी की। उन्होंने दलील दी कि एक ही प्रकरण में दो समानांतर कानूनी कार्यवाहियां चलाना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और कानूनी पेचीदगियों को देखते हुए वन विभाग की कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है और विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। न्यायालय के इस हस्तक्षेप के बाद याचिकाकर्ताओं को बड़ी अंतरिम राहत मिली है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने आत्मरक्षा और अपने साथी की जान बचाने के लिए कदम उठाया था, जिसे आपराधिक श्रेणी में रखकर प्रताड़ित करना अनुचित है।
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