पीलीभीत। टरक्वाइज वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष अख्तर मियां खान ने पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों के बदलते व्यवहार पर एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए संरक्षण के भविष्य पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अपने दशकों पुराने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि एक दौर वह था जब बाघ की एक तस्वीर लेने के लिए साल भर का इंतजार करना पड़ता था। बाघ इतने शर्मीले और एकांतप्रिय थे कि वे घने साल वनों और ऊंची घास के बीच खुद को छिपाए रखते थे, जहाँ इंसानी आहट का नामोनिशान नहीं होता था। उस समय पगमार्क तो हर जगह दिखते थे, लेकिन बाघ के दर्शन दुर्लभ थे। आज का परिदृश्य इसके ठीक उलट है; अब बाघ न केवल सड़कों और पगडंडियों पर आसानी से दिख रहे हैं, बल्कि मानवीय बस्तियों और खेतों के करीब उनकी बढ़ती मौजूदगी एक नई बहस को जन्म दे रही है।
अख्तर मियां के अनुसार, बाघों के व्यवहार में आया यह बदलाव केवल एक संयोग नहीं बल्कि गहरा पारिस्थितिक संकेत है। इसके पीछे मुख्य कारणों में जंगलों का विखंडन, बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ और बाघों की संख्या में हुई वृद्धि शामिल है। जब कुनबा बढ़ता है, तो युवा बाघ अपने नए इलाके की तलाश में जंगल की सीमाओं से बाहर निकलते हैं। इसके अलावा, नीलगाय और जंगली सूअर जैसे शिकारों की खेतों में बढ़ती मौजूदगी भी बाघों को इंसानी इलाकों की ओर खींच रही है। नियमित रूप से वाहनों की आवाजाही और इंसानी शोर से परिचित होने के कारण बाघ अब पहले की तुलना में कम सतर्क और अधिक ‘अभ्यस्त’ हो गए हैं, जो भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के जोखिम को और अधिक बढ़ा सकता है।
बाघों का यह बदला हुआ स्वभाव एक ‘दोधारी तलवार’ की तरह है, जिसे अख्तर मियां एक चेतावनी के रूप में देखते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यदि बाघ मानव बस्तियों के करीब रहेंगे, तो न केवल मवेशियों और इंसानों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि बाघों के लिए भी सड़क दुर्घटनाएं, बिजली के तार और अवैध शिकार जैसे जोखिम बढ़ जाएंगे। संरक्षण की सफलता तभी स्थायी हो सकती है जब स्थानीय समुदाय खुद को सुरक्षित महसूस करे। यदि संघर्ष की घटनाएं बढ़ती हैं, तो वन्यजीवों के प्रति सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ सकता है, जो दीर्घकालिक संरक्षण के लिए घातक सिद्ध होगा।
समाधान की दिशा में सुझाव देते हुए अख्तर मियां खान ने एक वैज्ञानिक और संवेदनशील प्रबंधन मॉडल की वकालत की है। उन्होंने सुझाव दिया कि पर्यटन को हर तीन से पांच साल में अगले जोन में स्थानांतरित किया जाना चाहिए ताकि पुराने क्षेत्रों का पुनरुद्धार हो सके। साथ ही, वन गलियारों की बहाली, स्थानीय समुदायों को त्वरित मुआवजा, मवेशियों के लिए सुरक्षित बाड़े और डेटा-आधारित निगरानी जैसे कदम उठाना अनिवार्य है। उनका मानना है कि समय रहते यदि इन चुनौतियों को अवसर में नहीं बदला गया, तो यह बदलता व्यवहार सह-अस्तित्व के बजाय संघर्ष की एक नई कहानी लिख सकता है।