पीलीभीत। ​स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय (एएसएमसी), पीलीभीत के आपातकालीन विभाग में हाल ही में एक ऐसा गंभीर मामला सामने आया, जिसने मानसिक और तंत्रिका संबंधी रोगों के आपसी जटिल संबंध को उजागर कर दिया। दरअसल, एक 37 वर्षीय महिला को अचानक अत्यधिक घबराहट, सांस लेने में तकलीफ, बंद स्थानों से तीव्र भय (क्लॉस्ट्रोफोबिया) और मृत्यु की आशंका जैसे गंभीर लक्षणों के साथ अस्पताल लाया गया था। महिला की नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्हें तुरंत आईसीयू (ICU) में भर्ती कर गहन निगरानी में रखा गया।
​आईसीयू प्रभारी डॉ. अरविंद एम. के नेतृत्व में जब मरीज की विस्तृत जांच की गई, तो हृदय और चयापचय (मेटाबोलिक) सहित अन्य आपातकालीन रिपोर्ट पूरी तरह सामान्य आईं। इससे यह साफ हो गया कि यह मामला तीव्र पैनिक अटैक का था। हालांकि, चुनौती तब और बढ़ गई जब पता चला कि महिला पहले से ही मिर्गी (सीजर डिसऑर्डर) की मरीज थीं। डॉ. अरविंद ने स्पष्ट किया कि पैनिक अटैक केवल एक मानसिक भ्रम नहीं, बल्कि एक वास्तविक जैविक प्रतिक्रिया है, जिसमें एड्रेनालिन का स्तर बढ़ने से धड़कन और सांस तेज हो जाती है। इसके अलावा, गंभीर मानसिक तनाव और तेजी से सांस लेना मिर्गी के दौरे को भी भड़का सकता है, इसीलिए ऐसे मामलों में बेहद सतर्क और बहु-विषयक इलाज की जरूरत होती है। आईसीयू टीम ने सूझबूझ से काम लेते हुए मरीज की एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं को री-एडजस्ट किया और उनकी नींद व मानसिक स्थिति में सुधार लाकर उन्हें सुरक्षित रूप से डिस्चार्ज कर दिया।
​अस्पताल की इस सफलता पर संस्थागत नेतृत्व ने पूरी टीम की सराहना की। महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. संगीता अनेजा ने कहा कि कई बार जांच रिपोर्ट सामान्य आने का मतलब यह नहीं होता कि मरीज की तकलीफ झूठी है। ऐसे संवेदनशील मामलों में सही चिकित्सकीय विशेषज्ञता और समग्र दृष्टिकोण बेहद जरूरी है। वहीं, उप-प्राचार्य डॉ. अरुण सिंह ने जोर दिया कि मिर्गी जैसे न्यूरोलॉजिकल रोगों के वैज्ञानिक इलाज के साथ-साथ मरीजों को मनोवैज्ञानिक सहयोग और सही परामर्श देना भी बेहद जरूरी है, ताकि उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सके।
​चिकित्सकों ने इस मामले के जरिए जनसामान्य को एक जरूरी संदेश भी दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पैनिक अटैक के दौरान होने वाले लक्षण जैसे—धड़कन बढ़ना, चक्कर आना या दम घुटना पूरी तरह वास्तविक होते हैं और क्लॉस्ट्रोफोबिया जैसी स्थितियां इसे और बढ़ा देती हैं। विशेषकर मिर्गी से पीड़ित मरीजों के लिए मानसिक तनाव का प्रबंधन जीवन रक्षक साबित हो सकता है। पैनिक डिसऑर्डर से पूरी तरह उबरने के लिए चिकित्सकीय इलाज के साथ-साथ तनाव नियंत्रण, जीवनशैली में सुधार और मजबूत मनोवैज्ञानिक सहयोग की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है।

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