​पीलीभीत। तराई क्षेत्र के पीलीभीत और दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों पर बढ़ते अवैध कब्जों, गन्ना माफिया के आतंक और इसके कारण बेकाबू हो रहे मानव-बाघ संघर्ष को लेकर लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद मोहम्मद हैदर रिज़वी ने केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ एक बड़ा कानूनी मोर्चा खोल दिया है. अधिवक्ता रिज़वी ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और उत्तर प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ‘अर्जेंट’ विधिक प्रतिवेदन भेजा है. इस नोटिस में उन्होंने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि यदि अगले 15 दिनों के भीतर इस गंभीर संकट पर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई नहीं की गई, तो वह व्यापक जनहित में कानूनी कदम उठाएंगे.
​अधिवक्ता हैदर रिज़वी द्वारा भेजे गए नोटिस में तराई क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के पूरी तरह चरमरा जाने का दावा किया गया है. नोटिस में राष्ट्रीय बाघ अनुमान रिपोर्ट 2022 का हवाला देते हुए बताया गया है कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों को रखने की वास्तविक क्षमता महज 38 है, लेकिन वर्तमान में यहाँ 71 से अधिक बाघ मौजूद हैं. इसी तरह, दुधवा टाइगर रिजर्व में भी क्षमता से कहीं अधिक 135 से ज्यादा बाघ रह रहे हैं. बाघों की इस अत्यधिक संख्या के कारण युवा बाघों को जंगलों में अपनी टेरिटरी (इलाका) नहीं मिल पा रही है और वे मजबूरन गन्ने के खेतों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसे वे जंगल का ही विस्तार समझ लेते हैं. यही कारण है कि इस पूरे क्षेत्र में इंसानों और बाघों के बीच खूनी संघर्ष चरम पर पहुंच गया है.
​नोटिस में बेहद संगीन आरोप लगाते हुए कहा गया है कि पीलीभीत, उत्तरी खीरी और आसपास के जंगलों में एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय है, जिसे स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के कुछ भ्रष्ट कर्मियों का मूक संरक्षण प्राप्त है. उत्तरी खीरी वन प्रभाग की लगभग 9,000 हेक्टेयर और पीलीभीत के सिंघारा तातारगंज, कम्बोजनगर, बाझपुर व बामहनपुर भगीरथ जैसे क्षेत्रों में हजारों हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर भू-माफियाओं ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है. उत्तर प्रदेश गन्ना विभाग की स्पष्ट ‘सट्टा नीति 2025’ के अनुसार, बिना राजस्व अभिलेखों के किसी भी किसान का गन्ना सट्टा नहीं किया जा सकता, इसके बावजूद माफिया वन भूमि पर अवैध रूप से गन्ना उगाकर उसे चीनी मिलों और क्रेशरों को धड़ल्ले से बेच रहे हैं.


​इस मानव-पशु संघर्ष की कीमत तराई के गरीब ग्रामीण अपने खून से चुका रहे हैं. वर्ष 2014-15 से लेकर अब तक के एक दशक के आंकड़ों के अनुसार, पीलीभीत में बाघ व अन्य हिंसक वन्यजीवों के हमलों में 69 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लखीमपुर खीरी में यह आंकड़ा 117 मौतों तक पहुंच चुका है. कटर्नियाघाट, दुधवा और पीलीभीत को मिलाकर अब तक 437 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. अधिवक्ता ने हाल ही में दुधवा के पास मझगईं रेंज के नौगवां गांव में बाघ के हमले का शिकार हुए गरीब मजदूर बाबूराम और अप्रैल 2018 में मारी गई कामता की घटना का विशेष जिक्र करते हुए पीड़ितों की बदहाली को रेखांकित किया है.
​अधिवक्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए जा रहे मुआवजे की राशि पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने तुलनात्मक विवरण देते हुए बताया कि यूपी में जान गंवाने वालों के परिजनों को केवल 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा रहा है, जो कि 2018 से जस का तस है. वहीं दूसरी ओर, मध्य प्रदेश सरकार ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी है, महाराष्ट्र में 25 लाख रुपये के साथ परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जा रही है, और उत्तराखंड तथा कर्नाटक-केरल जैसे राज्यों में भी यह सहायता राशि 20 से 26 लाख रुपये तक है. यूपी के संघर्ष-प्रवण जिलों में मानव जीवन की कीमत पड़ोसी राज्यों की तुलना में बेहद कम आंकी जा रही है.
​अधिवक्ता सैयद मोहम्मद हैदर रिज़वी ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों (जैसे टी.एन. गोदावर्मन और एम.सी. मेहता केस) और संविधान के अनुच्छेद 51-A(g) के तहत नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का हवाला देते हुए सरकार से 15 दिनों के भीतर ठोस कदम उठाने की मांग की है. उन्होंने मांग की है कि क्षमता से अधिक हो चुके पीलीभीत और दुधवा रिजर्व से बाघों को वैज्ञानिक तरीके से कम घनत्व वाले अन्य राष्ट्रीय अभ्यारण्यों में स्थानांतरित करने के लिए एक ‘राष्ट्रीय नीति’ बनाई जाए. साथ ही, एंटी-भू-माफिया टास्क फोर्स की मदद से वन भूमि से सभी अवैध कब्जों को तुरंत बेदखल किया जाए, अवैध रूप से उगाई गई गन्ने की फसल को जब्त कर सट्टे पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, और प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे की राशि को सम्मानजनक रूप से बढ़ाकर पुनर्वास की सुविधा दी जाए.
​इस विधिक नोटिस की प्रतियां राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के चेयरमैन, बरेली, लखनऊ व देवीपाटन मंडल के कमिश्नरों समेत लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर के जिलाधिकारियों, प्रभागीय वनाधिकारियो और पुलिस अधीक्षकों को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजी गई हैं।

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