-डॉ. अमिताभ अग्निहोत्री-

पीलीभीत। उत्तर प्रदेश का दूसरा और देश का 45वां टाइगर रिजर्व यानी ‘पीलीभीत टाइगर रिजर्व’ आज अपने सफर के ऐतिहासिक 12 वर्ष पूरे कर रहा है; आज ही के दिन साल 2014 में राज्य सरकार द्वारा इसके गठन की अधिसूचना जारी की गई थी, जिसने इस तराई अंचल को वन्यजीव संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर दिया। स्थापना के समय जहां इस घने जंगल में बाघों की संख्या महज 20 थी, वहीं बीते एक दशक में वन विभाग के कड़े संरक्षण, चौबीसों घंटे की निगरानी और बेहतर प्रबंधन के चलते यह कुनबा तेजी से बढ़ा और वर्तमान में यहां बाघों की संख्या 85 से 90 के बीच पहुंच चुकी है, जिसके जल्द ही 95 पार (95+) होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। बाघों की आबादी को रिकॉर्ड समय में दोगुने से अधिक करने की इस अद्भुत सफलता के लिए पीलीभीत टाइगर रिजर्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद प्रतिष्ठित ‘TX2 अवार्ड’ से नवाजा जा चुका है, साथ ही वैश्विक संरक्षण मानकों पर खरा उतरने के लिए इसे ‘कैट्स’ (CATS) अवार्ड भी मिल चुका है, जो इसके शानदार वन्यजीव प्रबंधन और वैश्विक साख पर मुहर लगाता है।


​बाघों के इस बढ़ते कुनबे और प्राकृतिक खूबसूरती ने पीलीभीत को पर्यटन के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में तब्दील कर दिया है, जहां अब न केवल देश के कोने-कोने से बल्कि विदेशों से भी भारी संख्या में सैलानी बाघों की एक झलक पाने और जंगल की शांति को महसूस करने पहुंच रहे हैं। यहां का प्रसिद्ध ‘चूका इको टूरिज्म स्पॉट’ अपनी अनूठी जल-संरचना और थारू संस्कृति के अहसास के लिए पूरी दुनिया के प्रकृति प्रेमियों की पहली पसंद बन चुका है, तो वहीं ‘सप्त सरोवर इको टूरिज्म स्पॉट’ भी अपनी असीम शांति और प्राकृतिक सुंदरता के कारण वैश्विक पटल पर तेजी से लोकप्रिय हुआ है। पर्यटकों की यह लगातार बढ़ती आमद न केवल इस टाइगर रिजर्व की लोकप्रियता को दर्शाती है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और होम-स्टे जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत कर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी एक नई रफ्तार दे रही है, जिससे वन्यजीव संरक्षण और जन-भागीदारी का एक बेहतरीन मॉडल तैयार हुआ है।


​भौगोलिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से पीलीभीत टाइगर रिजर्व का यह विशाल भूभाग जैव विविधता की प्रचुरता का एक अनूठा और बेहद समृद्ध संसार है, जो मुख्य रूप से ‘साल’ (Sal) के ऊंचे और खूबसूरत जंगलों से आच्छादित है। इस रिजर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां केवल हाथी और गेंडे को छोड़कर सभी प्रजातियों के दुर्लभ वन्य जीव स्थाई रूप से निवास करते हैं; हालांकि, पड़ोसी देश नेपाल की ‘शुक्लाफांटा वाइल्डलाइफ सेंचुरी’ से अक्सर हाथियों और गेंडों के झुंड सीमा पार कर पीलीभीत के जंगलों में आ जाते हैं, जो दोनों देशों के बीच वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारे (कॉरिडोर) के सक्रिय होने का प्रमाण है। इसके अलावा, यह जंगल पक्षियों की साढ़े 300 (350) से अधिक और तितलियों की लगभग ढाई सौ (250) से ज्यादा दुर्लभ प्रजातियों का भी बसेरा है, जो रंग-बिरंगे पंखों के साथ यहां के पर्यावरण को और अधिक समृद्ध बनाते हैं; अपने 12 वर्षों के सफर में इस रिजर्व ने यह साबित किया है कि सही इच्छाशक्ति से प्रकृति और वन्यजीवों का पुनरुद्धार कैसे किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *