गजरौला। कहते हैं कि जिनके इरादों में जान होती है, उनके आगे विपरीत परिस्थितियां भी घुटने टेक देती हैं। गजरौला थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव सिरसा सरदाह का एक छोटा सा बच्चा कौशल कुमार आज इस बात का सबसे जीवंत और भावुक कर देने वाला उदाहरण बन गया है। उम्र के जिस पड़ाव में बच्चे खेल-कूद और शरारतों में मशगूल रहते हैं, उस उम्र में कौशल के कंधों पर घर की जिम्मेदारियों का एक भारी बोझ है, जिसे वह बेहद मासूमियत और संजीदगी से उठा रहा है।

कौशल के पिता मैकूलाल शहर में एक सुनार की दुकान पर मामूली काम करते हैं। पूरे परिवार के भरण-पोषण और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए उन्हें हर रोज सुबह गांव से शहर जाना पड़ता है। पिता के शहर जाने के बाद पीछे खेतों को आवारा जानवरों और बंदरों से बचाने की पूरी जिम्मेदारी कौशल की मां पर आ जाती है, जो दिनभर चिलचिलाती धूप और ढलती शाम में फसल की रखवाली में जुटी रहती हैं। पिता का इकलौता बेटा होने के कारण कौशल को इस तंगहाली और मां के संघर्ष का अहसास बहुत कम उम्र में ही हो गया है।

हर रोज जब कौशल स्कूल से घर लौटता है, तो वह अन्य बच्चों की तरह आराम करने या खेलने नहीं जाता। वह तुरंत अपनी फटी-पुरानी किताबों, कॉपियों और कलम को एक थैले में समेटता है और सीधे खेत की मेड़ पर पहुंच जाता है। वहां शुरू होता है उसकी जिंदगी का असली और कड़ा संघर्ष। एक तरफ उसकी सतर्क नजरें मेहनत से सींची गई फसल को उजाड़ने आने वाले बंदरों पर टिकी होती हैं, तो दूसरी तरफ उसका ध्यान किताबों के पन्नों पर लिखे अक्षरों में अपना भविष्य तलाश रहा होता है। खेत की वही उबड़-खाबड़ मेड़ ही अब उसकी पाठशाला बन चुकी है। वह पूरे समर्पण के साथ एक हाथ से लाठी थामकर खेती की लाज बचा रहा है और दूसरे हाथ में कलम पकड़कर अपनी शिक्षा के दीप को बुझने से रोक रहा है।

आज के दौर में जहां मामूली परेशानियों या सुविधाओं की कमी का बहाना बनाकर कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, वहीं कौशल कुमार अभावों के बीच भी अपनी किस्मत खुद लिख रहा है। खेत की धूल और मिट्टी के बीच बैठकर पढ़ाई करने का उसका यह जज्बा न सिर्फ सिरसा सरदाह गांव के लिए, बल्कि समाज के हर उस इंसान के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो मुश्किलों से हार मान लेता है। कौशल ने यह साबित कर दिया है कि यदि कुछ कर गुजरने का संकल्प पक्का हो, तो गरीबी की दीवारें शिक्षा की राह कभी नहीं रोक सकतीं।

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