-डॉ. अमिताभ अग्निहोत्री-
पीलीभीत। अपनी अनूठी जैव विविधता और बाघों के प्राकृतिक वास के लिए दुनिया भर में विख्यात पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) में इन दिनों एक नया और गंभीर पारिस्थितिक बदलाव देखने को मिल रहा है। आमतौर पर नेपाल और उत्तराखंड के जंगलों से आने वाले प्रवासी हाथी यहां महज 15 से 20 दिनों का अल्पकालिक प्रवास करते थे और फिर अपने पुराने गलियारों से वापस लौट जाते थे। लेकिन पिछले छह महीनों से दो प्रवासी हाथियों ने पीलीभीत टाइगर रिजर्व को ही अपना ठिकाना बना लिया है। हाथियों का इस तरह महीनों तक यहां रुके रहना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए गहरी चिंता और बड़े अध्ययन का विषय बन गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं यह इस बात का संकेत तो नहीं कि प्रवासी गजराज अब पीलीभीत के जंगलों को अपना नया स्थाई आशियाना बनाने की राह पर हैं।
इस अप्रत्याशित व्यवहार के पीछे सीमा पार नेपाल के जंगलों में बढ़ता अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप एक मुख्य कारण माना जा रहा है। अतीत में नेपाल के जिन तराई क्षेत्रों और वनों में हाथियों का मुख्य बसेरा हुआ करता था, वहां अब इंसानी बस्तियां और बुनियादी ढांचे तेजी से विकसित कर दिए गए हैं। पारम्परिक रास्तों और प्राकृतिक आवासों में इस भारी दखल के कारण हाथियों की दिनचर्या और उनका स्वभाव बुरी तरह प्रभावित (डिस्टर्ब) हुआ है। जब हाथी अपने मूल परिवेश में असुरक्षित और असहज महसूस करते हैं, तो वे सुरक्षित ठिकानों की तलाश में नए क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं। यही वजह है कि नेपाल के अशांत माहौल से परेशान होकर इन हाथियों ने पीलीभीत के शांत और घने जंगलों को तरजीह दी है।

यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि इससे पहले कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में भी बिल्कुल ऐसा ही पैटर्न देखा जा चुका है। कतर्नियाघाट में भी पहले नेपाली हाथी कुछ दिनों के प्रवास पर आते थे और फिर वापस चले जाते थे, लेकिन वहां के अनुकूल वातावरण और मूल आवासों में व्यवधान के कारण अब प्रवासी हाथियों ने कतर्नियाघाट को ही अपना परमानेंट आशियाना बना लिया है। जाने-माने वन्यजीव व हाथी विशेषज्ञ दबीर हसन का भी यही मानना है कि जब भी हाथियों के मूल प्राकृतिक आवास में मानवीय गतिविधियों के कारण व्यवधान पैदा होता है, तो वे अपने लिए नए सुरक्षित ठिकाने तलाशते हैं। कतर्नियाघाट की तरह अब वही स्थितियां पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भी आकार लेती दिखाई दे रही हैं, जो आने वाले समय के लिए एक बड़े बदलाव का सूचक है।

हालांकि, हाथियों का पीलीभीत टाइगर रिजर्व में इतने लंबे समय तक रुकना जहां एक ओर यहां के समृद्ध ईको-सिस्टम को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह आने वाले दिनों के लिए एक बड़े खतरे का संकेत भी दे रहा है। यदि इन प्रवासी हाथियों ने पीलीभीत को अपना स्थाई बसेरा बना लिया, तो आने वाले दिनों में इस पूरे क्षेत्र में भीषण ‘मानव-हाथी संघर्ष’ की स्थितियां पैदा हो सकती हैं। यह आशंका इसलिए भी बलवती हो रही है क्योंकि वर्तमान में ये प्रवासी हाथी न केवल जंगलों की सुरक्षा के लिए लगाई गई मजबूत चैन लिंक फेंसिंग को आक्रामक रूप से तोड़ रहे हैं, बल्कि जंगल से सटे सीमावर्ती गांवों में घुसकर ग्रामीणों की मेहनत से उगाई गई फसलों को भी बड़े पैमाने पर तबाह कर रहे हैं।

खेतों में फसलों की बर्बादी और रिहायशी इलाकों के करीब हाथियों की लगातार मौजूदगी से ग्रामीणों में डर और आक्रोश का माहौल पनपने लगा है। यदि वन विभाग और शासन स्तर पर शीघ्र ही इस गंभीर समस्या की दिशा में कोई ठोस, दीर्घकालिक और व्यावहारिक नीति तैयार नहीं की गई, तो पीलीभीत टाइगर रिजर्व में यह वन्यजीव संकट एक नया और विनाशकारी रूप ले सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को हाथियों की मॉनिटरिंग बढ़ाने के साथ-साथ कॉरिडोर सुरक्षा और ग्रामीणों को जागरूक करने की योजनाओं पर तुरंत काम शुरू कर देना चाहिए, ताकि इस संभावित खतरे को समय रहते टाला जा सके।